सोमवार, 16 दिसंबर 2013

1971 भारतीय सेना की विजय गाथा

फिल्मी पर्दे पर आपने अभिनेताओं को एक साथ दस-दस गुंडों की पिटाई करते या उन्हें सीमाओं पर दुश्मनों को मारते देखा होगा लेकिन अगर आपको असल जिंदगी में हीरो देखने हैं तो आपको सीमाओं पर तैनात उन हीरोज को देखना चाहिए जो खून को जमा देने वाली ठंड में भी हमारी सीमाओं की रक्षा के लिए जी-जान एक कर देते हैं। अगर बहादुरी के सर्वोच्च शिखर को महसूस करना हो तो जैसलमेर जैसी गर्म जगहों पर ऊंठ पर बैठकर हमारी सीमाओं की पहरेदारी करने वाले सैनिकों से मिलना चाहिए जो जला देने वाली गर्मी में भी अपनी परवाह किए बिना देश की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। आज भारतीय सेना दिवस है. एक ऐसा दिन जब हमारी सेना अपनी आजादी का जश्न मनाती है। यूं तो साल के 365 दिन वह हमारी आजादी को बचाएं रखने के लिए संघर्ष करती है लेकिन इस एक दिन यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनकी खुशियों में शामिल हो और उनकी शहादत को याद करें।

1971 का भारत पाक युद्ध कौन भूल सकता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसने इतिहास बदल दिया। इस युद्ध में  पाकिस्तान के जनरल एएके नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया था।  इस आत्मसमर्पण के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश नाम का एक स्वतंत्र राष्ट्र बना था।  भारतीय सेना का यह गौरव हमारे मस्तक का तिलक है।



सन् 1971 में भारत ने लगभग दो सप्ताह के युद्ध में पाकिस्तान पर अभूतपूर्व विजय हासिल कर बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसे भारत की अब तक की सबसे बड़ी युद्ध विजय कहा जा सकता है |

"पाकिस्तान द्वारा 3 दिसम्बर, 1971 को भारत के पश्चिम में एक व्यापक युद्ध की शुरूआत कर देने के तुरंत बाद सेना मुख्यालय ने पूर्वी कमांड के जी.ओ.सी. इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. अरोड़ा को 'आगे बढ़ने' के आदेश दिए। वे इस आकस्मिक घटना के लिए सारे प्रबंध कर चुके थे तथा पूरी तरह से तैयार थे। अगली सुबह से ही 'स्वतंत्रता अभियान शुरू कर दिया गया।'

भारतीय सेना जब ढाका पर नकेल कस रही थी, सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ ने अपना मनोवैज्ञानिक आक्रमण आरंभ कर दिया। तंगेल पर कब्जा और पाकिस्तानी सेना के ढाका भागने वाले मार्गों को बंद करने के तुरंत बाद उन्होंने नियाजी को अपना प्रथम संदेश दिया तथा उसमें उन्हें आत्मसमर्पण का सुझाव दिया।

मेजर जनरल फरमान अली पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर के सलाहकार थे। जब उन्होंने देखा कि पाकिस्तानी सेनाओं ने आत्मसमर्पण करना प्रारंभ कर दिया है तथा महसूस किया कि पराजय निश्चित है और सिर्फ कुछ ही दिन दूर है, उन्होंने भागने का प्रयास किया; परंतु असफल रहे। 11 दिसम्बर को उन्होंने गवर्नर के माध्यम से यू.एन. को पाकिस्तानी सेनाओं तथा अन्य सिविल अधिकारियों को पाकिस्तान भेजने की व्यवस्था करने के लिए एक अपील की तथा प्रांत में निर्वाचित सरकार को स्थापित करने की मांग की। 

इससे पहले कि सुरक्षा परिषद इस पर सोच-विचार कर पाती, याह्या खां द्वारा इसे वापस ले लिया गया। सैम मानेकशॉ ने अपनी दूसरी अपील में फरमान अली को संबोधित करते हुए कहा, "आत्मसमर्पण करनेवाली सेनाओं को सुरक्षा तथा न्यायपूर्ण व्यवहार का आश्वासन दिया जाना चाहिए।"

"पेरशान ढाका को डराने के लिए शतरंज के खेल के घोड़ों की भांति आज रात भारतीय घेरेबंदी को कड़ा किया जा रहा है।" याह्या खां, नियाजी को डटे रहने और भारतीयों को ढाका की ओर बढ़ने से रोकने के लिए समझाते रहे तथा उनसे वादा किया कि 'कुछ बड़ा' आने वाला है, अर्थात् यू.एस. का 7वां जहाजी बेड़ा, जो पहले से ही शीघ्रता से बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ रहा था, उनकी सहायता के लिए प्रभावकारी हो जाएगा। उन्होंने यह वादा भी किया कि उनके मित्र राष्ट्र उनके लिए तथा पाकिस्तान के लिए हालातों को पूरी तरह बदल देंगे, लेकिन नियाजी तथा पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर डॉ. ए. एम. मलिक कुछ अलग ही सोच रहे थे।

14 दिसम्बर को जब डॉ. मलिक सरकारी भवन के बाएं भाग में अपने मंत्रिमंडल के साथ एक बैठक कर रहे थे, आई.ए.एफ. की आगे बढ़ने की सूचना पर बैठक स्थान में बवाल खड़ा कर दिया तथा विचलित मलिक को निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के साथ इस्तीफा दे दिया तथा इंटरकॉन्टिनेंटल होटल के तटस्थ क्षेत्र में आश्रय ले लिया। 

16 लोक सेवक तथा महानिरीक्षक पहले से ही होटल में आश्रय लिये हुए थे। सारी जिम्मेदारी परेशान नियाजी पर आ गई। उन्होंने आखिरी सैनिक के जिंदा रहने तक संघर्ष करने का निश्चय कर लिया। याह्या खां दोपहर में ही उनकी सहायता हेतु प्रस्तुत हो गए और भारतीय सेना कमांडर के समक्ष उनकी सेनाओं को आत्मसमर्पण करने की आज्ञा दे दी और उन्हें संघर्ष को रोकने तथा पश्चिमी पाकिस्तान के सभी सशस्त्र सैन्यकर्मियों एवं सभी निष्ठावान लोगों की जान बचाने का निर्देश दिया। 

भारतीय सेना जब ढाका के समीप पहुंची, तो खबरें आने लगीं कि यू.एस. 7वां जहाजी बेड़ा अपने नाभिकीय शक्ति-संपन्न विमानवाहक पोत प्रतिष्ठान के साथ प्रशांत पैसिफिक महासागर से बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ रहा है तथा उसका प्रयोजन पूर्वी पाकिस्तान में मौजूद कुछ अमेरिकी कर्मचारियों को मुक्त करवाना है। परंतु वास्तव में उसकी अतिरिक्त क्षमता का प्रयोग, आवश्यकता होने पर, नियाजी की सेनाओं को वहां से निकालने के लिए किया जाना था। 

उसकी विशाल गोलाबारी क्षमता को याह्या खां के लिए उपलब्ध कराया जाना था, ताकि वे ढाका में पाकिस्तानी कसाइयों को पुन: तैनात कर सकें और पूर्वी बंगाल की जनसंख्या में से भारतीय रक्षकों का सफाया कर सकें। प्रतिक्रियास्वरूप भारत ने वायुसेना के विमानों तथा नौसेना के जहाजों का प्रयोग करते हुए चटगांव व कोक्स बाजार की नाकेबंदी कर दी तथा समुद्र-निकास के इन स्थानों को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया।
15 दिसम्बर को जनरल नियाजी ने नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास से वास्तविक आत्मसमर्पण के बिना युद्ध-विराम की संभावना के संबंध में पूछताछ की। सैम मानेकशॉ ने उत्तर दिया कि युद्ध-विराम सिर्फ आत्मसमर्पण के साथ ही स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने नियाजी को सुरक्षा तथा न्यायपूर्ण बरताव का वादा किया। उन्होंने 'उनकी सद्भावना के प्रतीक रूप में' 15 दिसम्बर को शाम के 5 बजे से लेकर अगले दिन सुबह 9 बजे तक ढाका पर वायुसेना द्वारा सभी आक्रमण भी बंद करवा दिए तथा साथ ही यह वादा भी किया कि इसका पालन न किए जाने की स्थिति में आक्रमणों को और अधिक तीव्रता से आरंभ कर दिया जाएगा।

नियाजी ने 16 तारीख की सुबह लगभग 8 बजे इस अवधि को छह घंटे बढ़ाने की बात कही तथा इसे स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद उन्होंने कुछ आश्वासन और वादे भी लेने के प्रयास किए; परंतु उन्हें अस्वीकार कर दिया गया। भारतीय सेना प्रमुख ने बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग रखी तथा जेनेवा संधि का सम्मान करते हुए इसके पूर्ण पालन का वादा किया।

16 दिसम्बर को सुबह 10:40 पर - अल्टीमेटम समाप्त होने से पहले ही - पैरा बटालियन, जो ढाका के बाहरी क्षेत्र में पहुंच गई थी, ने मेजर जनरल मोहम्मद जमशेद और उनकी 26 इन्फैंट्री डिवीजन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। दोपहर के 3.30 बजे मेजर जनरल नागरा ने एक ब्रिगेड प्लस के साथ ढाका में प्रवेश किया तथा समस्त जन-समूह द्वारा उनका प्रफुल्लित स्वागत किया गया।

16 दिसम्बर, 1971 को दोपहर के 2.30 बजे जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण की प्रक्रिया शुरू कर दी तथा शाम के 4:31 बजे तक उन्होंने ऐतिहासिक ढाका रेसकोर्स में पूर्वी फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल कृष्णन, पूर्व के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ एयर मार्शल दीवान तथा बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी हाई कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ ग्रुप कैप्टन खोंदाकर की उपस्थिति में पूर्वी कमांड के जी.ओ.सी. इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत अरोड़ा के समक्ष औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया। 

उल्लेखनीय है कि इसी स्थान पर से मुजीबुर्रहमान ने मार्च 1971 में राष्ट्रपति याह्या खां का जबरदस्त विरोध किया था। ढाका 'खुशी से झूम उठा।' लोगों का यह उन्माद महीनों का भय तथा आतंक की बेहद सहज प्रतिक्रिया थी। समारोह के तुरंत बाद नियाजी ने अपनी कमान को युद्ध-विराम तथा आत्मसमर्पण करने के आदेश जारी कर दिए। 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। याह्या खां पूरी तरह से हार मान चुके थे तथा बांग्लादेश एक स्वतंत्र संप्रभु देश के रूप में अस्तित्व में आ गया।"

(साभार : 1971 भारत-पाक युद्ध, 161वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की शौर्य गाथा, लेखक-जनरल के.के. नंदा)

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